अलौकिक शक्ति क्या है? और शक्ति है कौन ?शक्ति का आदि रूप सर्वेश्वरी हैं। आदि पराशक्ति ही पराप्रकृति मांँ सर्वेश्वरी के स्वरूप है।🙏🏼🙏🏼🌹🌹

शक्ति-क्या-है
शक्ति

जिस अलौकिक शक्ति का हम चिंतन कर रहे हैं वह कोई दूसरी बाहरी वस्तु नहीं है। वह हमारे और आपके बीच का ही है। हम शायद उसके सही रूप को पहचान नहीं पाते हैं, या सही क्या है ?उसकी सही पूजा क्या है, समझ नहीं पाते हैं उसकी आराधना यह फल फूल धूप दीप नैवेद्य ही है , तो यह हो नहीं सकता क्योंकि यह तो सामग्री है कोई देवता तो है नहीं कि धूप और दीप और नैवेद्य आदि से तौलकर उसके मापदंड से उसको ले लिया जाए ।

बंधुओं हमारा उत्तम पवित्र विचार पवित्र भावनाएं और पवित्र आचरण जब तक नहीं होगा तब तक व पवित्रता और उस पवित्रता का जो गुण है वह हम से वंचित रह जाएगा ।नहीं तो वह पवित्रता को तो ढूंँढता रहा है ढूंढ रहा है कि हम मिले , प्राप्त करें…

अलौकिक शक्ति क्या है?

शक्ति का आदि रूप सर्वेश्वरी हैं। जिनकी कृपा से सभी कुछ सुलभ है सर्वेश्वरी ही एक अलौकिक शक्ति है जिसका अस्तित्व कण -कण में है। यह महाकाली, महालक्ष्मी , महासरस्वती जिनकी हम उपासना करते हैं वह त्रिगुणात्मक शक्ति हैं।

आदि स्वरूप शिव भी शक्ति में ही निहित है। शक्ति के बिना शिव भी शव समान है।

संसार की कर्मशाला में अलौकिक शक्ति से परे कुछ नहीं विश्व का प्रत्येक कार्य शक्ति द्वारा ही होता है।जिस शक्ति का हम चिंतन कर रहे हैं वह कोई दूसरी बाहरी वस्तु नहीं है। वह हमारे और आपके बीच का ही है।
हम शायद उसके सही रुप को पहचान नहीं पाते हैं या सही क्या है ,उसकी सही पूजा क्या है, समझ नहीं पाते हैं। चराचर में सभी प्राणी शक्ति के प्रतीक है।

शक्ति को ही योगिनी कहते हैं जब शक्ति प्राप्त हो जाती है तो पुरुष भी योगिनी पद प्राप्त कर लेता है। प्रत्येक प्राणी के लिए आवश्यक है कि वह अपने में शक्ति के संचय का अभ्यास करें।

जिसे अलौकिक शक्ति ने मान्य दिया, आदर दिया, सम्मान दिया, वह शक्तिमान हो गया, वह श्रीवान् (श्रीमान) हो गया। और जिसेसे उसने अपनी छाया हटा लिया, और जिससे वह छाया हटा गया, वह बिल्कुल निष्कलंक रहते हुए भी कलंकित हो जाता है। उस पर हरेक तरह का, हजारों अपराध की जुम्मा लोग ढहाते रहते हैं।

मनुष्य का जीवन भींगे कपड़े के समान है।जिस प्रकार भींगी धोती को धूप में फैलाते हैं तो उसपर ईट आदि रख देते हैं ताकि कपड़ा उड़ ना जाए, ठीक उसी प्रकार मनुष्य जीवन में भी शक्ति रुपी ईट का रखना परम आवश्यक है नहीं तो हमारा जीवन भीगे कपड़े की तरह उड़ जाएगा।

शक्ति क्या है? क्या स्त्री जाति को देवी कहते हैं ? नहीं … शक्ति के प्रतीक को देवी कहते हैं।
जिस प्रकार शक्ति की कसौटी पर लोहा का महत्व आका जाता है, ठीक उसी प्रकार देवी को जानो।

देवी देने वाली होती है दिलाने वाली होती है दिए दिलाए को छिन लेने वाली होती है उसे ही शक्ति कहते हैं, पौरुष कहते हैं, लोहा कहते हैं, सोने की रक्षा करने वाला उसे लोहा कहते हैं।

मां भगवती एक संघटना अर्थात संगठन है। सभी देवताओं की शक्तियांँ मांँ भवानी में सन्निहित है।

पृथ्वी में जो सागर है वह खारा है।मातृय वात्सल्य में जो सागर है वह झीर का सागर है । नारायण झीर सागर में निवास करते हैं, न की खारे सागर में। पृथ्वी की सभी स्त्रियां झीर सागर की घोतक है। झीर सागर का आनंद, सुख ,संसार- रूपी सागर की गहराई की भी गहराई से ज्यादा गहरा है।https://poojashankar30.com

अलौकिक शक्ति को समझने और साधने का प्रयास कैसे करें?

अलौकिक शक्ति क्या है, वह तो भगवती का स्वरूप है अनेकों शक्तियों के रूप में एक ही शक्ति नाना प्रकार के देश काल समय ,पात्र की भिन्नता के कारण वह भिन्न-भिन्न सा समझी जाती हैं मगर ऐसा है नहीं, वह एक ही शक्ति है।
वह अलग-अलग स्थानों में ब्रह्मा के स्थान में ब्रह्म कह के देखी जाती हैं, विष्णु के स्थान में विष्णु कहकर देखी जाती है, शिव के स्थान में शिव कह कर देखी जाती हैं।

इस तरह से महापुरुषों के भिन्न-भिन्न स्थानों में वह दूसरों का, जैसा उनका विचार या जैसी उसकी दिनचर्या, जैसा उसका समय काल के अनुकूल व्यवहार विचार और आदर्श होता है। उसी के अनुकूल उनका आचरण भी बनने लगता है। वह आचरण वही देवी है, वही भगवती वही माता है।

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अलौकिक शक्ति को समझने और साधने का प्रयास कैसे करें?


इन्हें एक ही शक्ति अपने ठोस बुद्धि से समझने का प्रयत्न करना चाहिए। यदि नहीं होता है तो भी भिन्न भिन्न रूप में समझने का प्रयत्न करें। किसी न किसी रूप में उन्हें जानने ,और जानना सरीखे होने के लिए प्रयत्न करना चाहिए। और यही प्रयत्न हमारी वह पूजा है ,प्रार्थना है ,आराधना है ,और हमारा अटूट विश्वास है। जिस विश्वास के अभाव में हम बहुत कुछ, बहुत कुछ खो देते हैं।

उस मातेश्वरी भुनेश्वरी की आराधना में अपना चिंतन और मनन समय जो निकालकर थोड़ा उनकी सेवा में अर्पण करते हैं वह हमारा समय एकत्रित होते होते एक रोज विशाल पूंजी के रूप में विशाल संपन्नता के रूप में विशाल हृदय के रूप में उदय होगा और वही उदय होगा तब हमारे और भी शुभचिंतक है या और जो हमारे परिजन हैं उन सब को वह शांति ,सुख,वह आनंद मिलेगा।

मैं तो यह निवेदन करूंगा कि हमें यदि अन्न वस्त्र जल आदी समय काल से मिल रहा है तो, यह उसी माता की कृपा है, उसी की दया है ।और नहीं तो बहुत से प्राणी इससे वंचित रहते हैं।

हमे उस महाशक्ति अलोकीशक्ति भगवती को तो भाव से पूजना होगा, भाव से ही जानना होगा भाव से ही देखना होगा जहां भाव का अभाव होगा वहां पर वह बिल्कुल नहीं होगी । वह आपकी भावना की भूखी है और भाव से ही आप जल ,फल ,फूल इत्यादि जो अर्पण करते हैं वह उसकी गंध मात्र, वायु के माध्यम से, अग्नि के माध्यम से, उन तक पहुंचता है।

पराप्रकृति मांँ सर्वेश्वरी के स्वरूप

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मांँ

परा प्रकृति मांँ सर्वेश्वरी के रूप में उनके तीन भाव हैं (पुत्री ,भार्या और मांँ) महाकाली ,महालक्ष्मी और महासरस्वती के। आप जानते ही हैं, कलौ काली कलौ काली ।कलयुग में तो काली ही प्रधान देवता हैं।

वह शक्ति हम लोगों के जीवन में यानी मनुष्य के जीवन में सदैव और सब काल में सब जगह सदैव एक समान नहीं ढल पाती हैं और यही कारण है कि हमें वह बार-बार चिंतन करना मनन करना और उसे अध्ययन करना और बार-बार उसे दोहराना पड़ता है, कहवाना पड़ता है। सुनाना और सुनवाना पड़ता है ।
यह वह गीत है जो गाया नहीं जाता ।गीतांजलि और अनेक जो गीत गाए जाते हैं उनसे यह भिन्न है। यह गीता नहीं है। यह वह गीता है जो गाया नहीं गया हो, सिर्फ अनुभव किया गया हो ।कहां पर ? संघ में , यानी संगीत में , ढूंढो इसे। झुन्ड में बैठ कर देखो इसे ,अकेले नहीं। किसको? गीत को ।इसलिए यह भी संगीत है। संघ का गीत है ।

संगीत का अर्थ है जो अच्छे से अच्छे विचारों को जन्म दिया हो जो प्राणी जो सभी प्राणियों के सुख और सभी प्राणियों के हित के लिए हो ।वह त्रिया, दिन -रात्रि महाकाली ,उसके पश्चात महालक्ष्मी और उसके पश्चात महासरस्वती ।


अपने मन में जो बहुत सारे कलुषित विचार हैं अंधकारमय विचार हैं, अंधकारमय में भावनाएं जो उत्पन्न होती है उन्हें तिरोहित करने के लिए और उसे विगतज्वर करने के लिए मनुष्य प्राणी उस महाकाली की उपासना करते हैं, चिंतन करते हैं मनन करते हैं।

महालक्ष्मी…चतुर्थ पद में आती हैं। वह महालक्ष्मी जो मेरी हर कामना की ,हर इच्छा की पूर्ति करती हैं।

ऐसा हैं कि ,लक्ष्मी के आने पर उनके पिता ने उनके आंचल में बालू दिया था विदाई के समय कुछ रहा नहीं ।और वही लेकर अपने ससुराल आई थी। यही कारण है कि वे जहां भी रहती हैं ,झाड़ती रहती है अपना आंचल और आंचल झड़ने पर सब कुछ संपन्नता तो प्राप्त होती है मगर आंख में किरकिरियाँ पड़ जाती है तो दिखाई नहीं पड़ता। छोटे लोग दिखाई नहीं पड़ते।


महासरस्वती ….यह है ललिता । यह वाणी में ओज देती हैं । ललित बना देती हैं । वाणी में बहुत मधुरता ले आती हैं। यह सरस्वती की उपासना सातवें दिन से प्रारंभ होती है।


हमे माता सरस्वती से ये प्रार्थना चाहिए कि आप हमारे इस स्वर को ललित बना दें। हे ललिता !और इतना ललित ,इतना मीठास कितना सौंदर्य कि हिंसक से हिंसक प्राणी भी मेरे स्वर को सुनकर अपनी हिंसा को त्याग दें। अहिंसक हो जाए। मैत्री करे। एक दूसरे के प्रति स्नेह का भाजन बन सकें।

पारलौकिक माता ,पराप्रकृति

पारलौकिक माता है, उनको तो कहना ही क्या है। इस लोक में भी सुख देती हैं ,परलोक में भी सुख देती है। इस लोक में भी रक्षा करती और परलोक में भी रक्षा करती है ।


अगर उनके हाथ हम लोगों पर से हट जाए, उनकी छाया हट जाती है, उस वक्त हम लोग भहराकर पर भूमि पर गिर जाते हैं। कोई स्थान नहीं रहता है फिर भी उसी पृथ्वी की गोद में जा गिरते हैं। फिर भी उसके चरणों में गिरना पड़ता है।तदपि हमारा अपराध हमारे अपने ओर से क्षमा नहीं हो पाता है। फिर माता ही उसको क्षमा करती है, संभालती है। पृथ्वी रूप होकर संँभालती है। करुणा रूप होकर संभालती है ।


हम लोगों को पारलौकिक माता के प्रति आदर होना चाहिए,स्नेह होना चाहिए ,बराबर जीवन में उसकी सेवा करनी चाहिए। कैसे उसको सेवा जाए? जैसे कोई मुर्गी अंडा को सेती है।

अलौकिक शक्ति मांँ सर्वेश्वरी आदि पराशक्ति से प्रार्थना

हमें अंबिका से बारम्बार निवेदन करना चाहिए कि हमारी श्रद्धा, हमारा विश्वास जो हमारे महान मन, मनु का सहयोग भी करें समय काल पर और उसके साथ उन्हें स्थिर भी रखे, चंचल होने से बचाऐं। क्योंकि वह जब चंचल होंगे तो इस पराप्रकृति में सौरमंडल में बड़ा भयंकर उत्पात हो सकता है ।

हमें उस अलौकिक शक्ति, मांँ सर्वेश्वरी से यही प्रार्थना करनी चाहिए कि हे भगवती! मैं इस जीवन में आप से और कोई चीज नहीं मांगता हमको इतना पूर्ण कर दे कि हमें किसी तरह का अभाव ही ना रहे, और यदि हममें अभाव नहीं होगा तो हम आप से याचना ही नहीं करेंगे।


दुःख क्लेश और वेदना जब उत्पन्न होती है हमारे शरीर में , तो चारों तरफ अंधकार में ,पारलौकिक मांँ के सिवा और कोई नहीं दिखता। उसी को, चाहे वह पृथ्वी की माता हो, पृथ्वी ही हो , चाहे वह आकाश रूपी माता हो, चाहे वह दिशायें रूपी माता हो, और चाहे वह हमारी आह रूपी माता हो। उसी आस के सहारे जीवन यह चलता रहता है।


हम कितना ही गलत हो जाते हैं कितना हि गलत हो जाते हैं। मगर वहाँ से सब कुछ झम्य होता हैं, सब कुछ झमा होता हैं। मगर हम इतना ज्यादा गलत हो जाएँ कि हम उनका कहलाने के अधिकारी ही ना रहे, हम उनका है ही नहीं, तो माता क्या करेगी?

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(1) Comment

  1. Gaurav prashant tripathi

    बहुत ही सारगर्भित वयाख्या,शक्ति के रहस्य की

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