गुरु का महत्व, गुरु क्या है? गुरु दीक्षा और गुरु मंत्र का महत्व

jai maa guru

गुरुदेवजी त्वमपाहिमाम् शरणागतम्

गुरु का स्थान तो इस संसार में ईश्वर से भी बड़ा होता है जिस प्रकार सूर्य के उदय होने से अंधकार दूर होता है। उसी प्रकार गुरु के वचन मन में फैले अंधकार को नष्ट करते है। उसे ज्ञान की दिव्यता से सुसज्जित करते है। गुरु की शरण तीर्थ के समान होता है। जो गुरु का अपमान करें ,जो गुरु पर संदेह करें जो गुरु की अवहेलना करे।उसका अंत तो निश्चित होता है।
गुरु की स्वीकृति और उनके आशीष के बिना किया गया कोई भी कार्य,अपनी पराकाष्ठा तक नहीं पहुंच सकता। गुरु की योग्यता और गुरु की महानता उसके शिष्य की सफलता पर आश्रित नहीं होती। गुरु तो ज्ञान का महासागर होता है। इस महासागर में कौन सा शिष्य कर्ण चुना है और कौन सा मोती, यह तो शिष्य पर ही निर्भर करता है।

गुरु का महत्व एवं अर्थ

गुरु वह तो प्राण है और जब तक तुम्हारा प्राण रहेगा गुरु भी तुम्हारे अभ्यंतर में विराजमान रहेंगे। हमारे जीवन में गुरु का बहुत महत्व होता है वो मार्गदर्शी होते है, हम अपने जीवन के कठिन से कठिन निर्णंय लेने में समर्थ होते है|

यह गुरु क्या है? ब्रह्मा विष्णु महेश होते हैं! उन तीनों के दृष्टि देने वाले होते हैं इनसे भी बडे होते है,ब्रह्मा विष्णु और शिव से भी ।क्योंकि इनके पास तक पहुंचाने वाला होते है मिलाने वाला होते है इन से ऊंचा स्थान दिलाने वाले होते हैं गुरु।

शास्त्रों में गुरु का अर्थ बताया गया है अंधकार को हटाकर प्रकाश की ओर ले जाने वाले को गुरु कहा जाता है। अर्थात दो अक्षरों से मिलकर बने गुरु शब्द का अर्थ है: प्रथम अक्षर गु का अर्थ अंधकार होता है जबकि दूसरे अक्षर रू का अर्थ उसको हटाने वाला होता है।

गुरु तत्व की प्रशंसा तो सभी शास्त्रो ने की है।ईश्वर के अस्तित्व में भेद हो सकता है किंतु गुरु के लिए कोई भेद आज तक उत्पन्न नहीं हो सका गुरु को सभी ने माना है। प्रत्येक गुरु ने दूसरे गुरुओं को आदर प्रशंसा एवं पूजा सहित पूर्ण सम्मान दिया है।

“गुरु कुम्हार शिष कुंभ है, गढ़-गढ़ काढ़ै खोट।
अंतर हाथ सहार दै, बाहर मारै चोट॥”

शिष्य मिट्टी के कच्चे घड़े के समान है। जिस तरह घड़े को सुन्दर बनाने के लिए अन्दर हाथ डालकर बाहर से थाप मारते हैं ठीक उसी प्रकार शिष्य को कठोर अनुशासन में रखकर अन्तर से प्रेम भावना रखते हुए शिष्य की बुराइयों को दूर करके संसार में सम्माननीय बनाता है।

  • गुरु गुरु बनाता है चेला नहीं।

सद्गुरु वह है जो शिष्य को अपने सामान सद्गुरु बनाकर उसको अपने जैसे सद्गुरु बनाने की क्षमता प्रदान करता है। गुरु का सानिध्य शिष्य को स्वतः सिखला देता है।

  • मांँ गुरु

गुरु मांँ का ही दूसरा रूप होते हैं, इसीलिए उन्हें मांँ गुरु भी कहते हैं ।जैसे माता का स्नेह अपने पुत्रो के लिए होता है। ठिक उसी प्रकार गुरु का स्नेह होता है अपने शिष्यो के लिए।

तथा जिस प्रकार माता अपने पुत्रों को बुरी नज़र से बचा कर रखती हैं उसी प्रकार गुरु भी अपने शिष्यों की रक्षा करते है।गलत संगत और अवगुणो से रक्षा करते है।

  • गुरु का जीवन में महत्व

हमारे जीवन में गुरु का बड़ा ही महत्व है जब हम हर जगह से थक जाते हैं , हार जाते हैं तो अपने गुरु की शरण में आते हैं। हमारे गुरु हमें हर तरफ से अपनाते हैं और हमें अपनी मुसीबतों से निकालते हैं।जब कोई साथ नहीं देता है तो गुरु साथ देते हैं। हर जगह से खाली हाथ वापस आ सकते हैं लेकिन गुरु के घर से कभी कोई खाली हाथ वापस नहीं आया है। गुरु सदैव अपना एक हाथ अपने शिक्षक के ऊपर रखे रहते हैं।गुरु शरण में कोई बाधा नहीं ।

गुरु एक स्टेशन के समान है आप वहां से हर स्थान का टिकट ले सकते हैं। विधि के विधान को बदल सकने की शक्ति गुरु में होती है।

गुरु वही है जिसके साक्षात्कार से आत्मा में शांति प्राप्त होती है। वास्तविक गुरु वही है जिसे देखने से पवित्रता का भाव उत्पन्न हो ह्रदय में नए विचारों का उद्गम हो सहज ही में आत्मा सिद्धि प्राप्त हो।

उपासना और पूजा जो हम लोग करते रहते हैं इसमें जब तक गुरु से राय नहीं लेंगे गुरु उसको बताएगा नहीं तब तक सफलता मिलना संभव नहीं है।

गुरु एवं उनके वाणी के प्रति शिष्य का अगाध विश्वास

गुरु-का-महत्व
Jai Agoreshwer गुरु-का-महत्व

बिना गुरु भव निधि तरही न कोऊ।

अपने गुरु हों, आचार्य हो उनके प्रति अटूट विश्वास रखें। तभी उनके गुण आप प्राप्त कर सकेंगे और आप आत्मशक्ति और सुख का अनुभव कर सकेंगे श्रद्धा और विश्वास से दूर बड़े से बड़ा साधन भी चाहे वह कितना बड़ा विद्वान क्यों न हो आत्म शक्ति और प्रभु कृपा नहीं प्राप्त कर सकता। पवित्र एवं निश्चल हृदय से ही आप पूर्ण शांति और प्रभु कृपा प्राप्त कर सकते हैं।

सभी सधनायें साध्य हैं। पर सभी साधनायें सभी के लिये साध्य नही हैं। गुरु अपने शिष्य के कुल-शील एवमु उसकी प्रक्रिति के अनुकुल जो साधनाये बताता हैउसे ही, गुरु की वाणी पर अकाट्य विश्वाश कर साध्य करने में रत रहना चाहिये। क्योंकि सामर्थ गुरु ही इस पराप्रकुति के प्रक्रुति को अपनी प्रक्रुति में समाहित करना या अपनी प्रक्रुति को पराप्रकुति के प्रक्रिति में समाहित करना बता सकता है।

परंतु गुरु पर अगाध विश्वास का उसपथ पर चलना शिष्य को ही होता है।सभी साधको को इस मुल मंत्र को सिखना होगा। क्योकि सबसे बडा द्रोहि गुरुद्रोहि होता है। वह अपना तो लोक बिगाडता ही है,अपने साथ-साथ अपने कुल का भी नाश करता है।गुरु के प्रति अगाध विश्वास ही हमें उस अग्यात के सन्निकट ले जाने में सहायक होता है।

सर्वोपरि तुम्हें गुरु के सावधान वचनों में ईश्वर के अधिक से अधिक विश्वास करना होगा श्री देव ईश्वर से भी बहुत ऊंचे स्थान पर तुम्हें गुरु को मानना है देखना है यह विवेक का परिचायक है।

गुरुजन का पूजन और उनको प्रणाम जितनी दूर से करेंगे ,उतना ही अच्छा होगा | इसमें आतुरता का व्यवहार अशोभनीय है | कोई बड़ा से बड़ा कार्य ,ईश्वर की अनुभूति भी व्याकुलता से सिद्ध नहीं होगी | शांत चित्त होने पर अपने आप स्फुरण होने लगता है ,उसकी दिशा मिलने लगती है | इस तरह चलने पर तत्क्षण सफलता मिलती है |

गुरु पिठ का महत्व

गुरु वह पीठ है , जिसके दर्शन मात्र से मन में नये विचारों का उद्गम होता है एवं मन में ईश्वर की भावना आ जाती है ।

अपने प्राणमय गुरु का सानिध्य ही एकमात्र ऐसा शरण स्थल है जो हंसी खुशी के साथ हमें क्लेश, वेदनाओ और दुखों से त्राण दिला सकता है।

गुरु वह पिठ है ,जिसके द्वारा व्यक्त किया हुआ विचार तुम में परिपक्वता का पूरक होगा। यदि तुम उसे पालन करते रहोगे, तो गुरुत्व को जानने में सर्वप्रकार से समर्थ होओगे ।गुरु तुम्हारे विचार की परिपक्वता, निष्ठा की परिपक्वता, विश्वास की परिपक्वता है ।

चेला अपने गुरु से बड़ा नहीं किंतु सिद्ध चक्क्षु पाया हुआ शिष्य अपने गुरु के सामान आसन का अधिकारी होता है । गुरु से उच्च आसन का अधिकारी नहीं है।

गुरु एवं शिष्य में केवल इतना ही अंतर होता है कि गुरु थोड़ा पहले जानता है और शिष्य थोड़ी देर बाद ।

शास्त्र- पुराण हमको सीमा में बांधकर उलझा देते हैं ।अपने विचार को विचार के क्षेत्र में विचरण करने नहीं देते….. सीमित बना देते है,

गुरु के वचन ही भले ही, भले ही वे शास्त्रीय विचार ना हो , देश काल और समय की आवश्यकताओं के अनुकूल होते हैं और सब भावनाओं को काट कर तुम्हें मुमोक्ष को पहुंचा ही देंगे। गुरु के वचन तुम्हारे लिए रहस्योदघाटन करते हैं और तुम्हारे उज्जवल भविष्य के लिए मंगल मूर्ति रुप दर्शाते हैं।

  • गुरू देह नहीं अपने ही प्राण हैं । कैसे?

प्राण मय गुरू सभी जगह, सर्वत्र,सहज में अभ्यास के द्वारा जाने जा सकते हैं; देखे जा सकते हैं; महसूस किये जा सकते हैं। हमें यदि शक्तियों को हस्तगत करना है तो अपने गुरू की भिन्न-भिन्न अवस्थाओं; उस काल में अपने गुरू के द्वारा कार्यों को पुर्ण करने की उनकी मुद्रा एवम् स्थिति पर ध्यान देने से उसे स्मरण करने से अपने प्राण से प्राणिपात करने से हमें भी वह शक्तियाँ हस्तगत हो सकती हैं।

गुरू तो हमारे प्राण हैं वो अन्यत्र नहीं हैं। जब तक हमारे प्राण हैं हमारे गुरू हमारे अभ्यन्तर में विराजमान रहेगें। जिस दिन हमारे अभ्यन्तर से अनिश्चितताएँ समाप्त हो जायेंगी उसी छण हमें अपने गुरू के विभिन्न कार्यों के सम्पादन की भाव-भंगिमाओं का ध्यान करने पर वह सारी शक्तियों हस्तगत होने लगेगी जो उस भाव-भंगिमाओं की अवस्था में हमारे गुरू ने हस्तगत किया है।

तुम्हें जिन जिन कार्य की सिद्धि करनी है भिन्न-भिन्न अवस्थाओं और काल में अपने गुरु द्वारा उन उन कार्यों के संपादन के समय की उनकी मुद्रा और स्थिति पर ध्यान दो, उन्हें स्मरण करो, अपने प्राण से उनके समक्ष प्राणी पात्र करो।

बंधुओ, जो गुरु का शिष्य होता है ,जैसे पिता – पुत्र होता है उस पिता के पुत्र पर पिता के रंग-रूप और उसकी हाव-भाव पहनावे का छाया हो जाता है। इसी तरह गुरु के शिष्य में भी बहुत कुछ सामंजस्य उनमें हो जाता है ।उनकी तरह बैठना -उठना ,बोलना व्याख्या करना, व्याख्यान देना ,समझना ,समझाना और नम्रता धैर्य था उनमें कोई कटुता नहीं होती।

  • गुरु के विषय पर –
गुरु-का-महत्व
Jai Maa Guru

यह विषय बहुत कठोर है ।कठोर से भी कठोर है और सुलभ से भी सुलभ है । शांतिप्रिय भी है और मनुष्य के लिए परमार्थ का एक पगडंडी है। जिस पर चलकर मनुष्य जीवन से जो अनेकों तरह के कृत्य ,अकृत्य, सुकृत्य जो जाने अनजाने में हो जाता है। वह सब जिसे भगवान ईश्वर भी क्षमा नहीं करते उसे गुरु क्षमा कर देते हैं।

मनुष्य का जीवन भी गुरु के लिए दर-दर भटकता चलता है वह महापुरुष कब और कहां और कैसे किस परिस्थिति में मिले और मिलने पर मुझे विश्वास कैसे होगा…

गुरुओं के बारे में पहला यह है कि गुरु में विश्वास करना और वह विश्वास होगा नहीं ।क्योंकि गुरु कोई हाड-चाम मांस का पुतला नहीं होते हैं। गुरु सभी जाति ,कास्ट सभी देश काल में होते हैं। अपनी परिस्थिति के अनुकूल होने पर और भगवती कृपा होने पर वह जो सुगमता से प्राप्त हो जाते हैं और नहीं तो सारा जीवन ढूंढते रहे व्यक्ति को प्राप्त नहीं होते हैं।

जब तक गुरु में श्रद्धा और विश्वास नहीं होता है पूर्ण रूप से तब तक कोई विद्या भी नहीं फलता फूलता है। यह बड़ा मुश्किल है जीवन में ऐसे अनेक व्यवहार, और विनोद से आप उबकर, अपनी अश्रद्धा भी हो सकता है ।जिस तरह जिस मंत्र के प्रति गुरु के प्रति देवता के प्रति थोड़ा अश्रद्धा हुआ तो वह सारा विद्या का लंबी आयु बढ़ जाता है प्राप्त करने में, वह अप्राप्त हो जाता है। फिर नहीं प्राप्त होता , वह चला जाता है।

यदि हमारा गुरु हम पर बिगड़ता है हमारी उपेक्षा कर रहा है यह हमारे प्रति कड़ी शब्दावली का प्रयोग कर रहा है तो इसके कारणों के प्रति हमें अवश्य सचेत होना चाहिए । उसके इस व्यवहार के पीछे भावना कल्याणकारी होगी ।वह हमारे आलस्य कायरता चिंता तथा विघ्नो को दूर कर संभावित विपत्तियों से हमारी रक्षा की दिशा में अवश्य ही प्रयत्नशील होगा।

यदि आपके मन में कोई भी जिज्ञासा है तो गुरु के मूड व मोनोस्थिति को देख कर उसे व्यक्त करना चाहिए।

  • गुरु शिष्य को अपने सामान सद्गुरु बनाने की क्षमता प्रदान करता है|

गुरु का महत्व और गुरु के शिष्यों का भी महत्व बहुत है। और शिष्य चाहे तो गुरु का उद्घार भी कर सकता है बहुत से शिष्य ऐसे भी हुए हैं कि गुरु को गर्त से भी निकाले हैं।

जितनी शक्ति गुरु में नहीं हो तो पाती कभी-कभी उससे अधिक शक्ति शिष्य में भी पाए जाता है। वह गुरु का भी उद्धार कर सकता है अपने श्रद्धा और विश्वास के बल पर। स्वर्ग को खरीदने का वह अधिकार व संपदा उसको प्राप्त हो जाता है।

कुछ लोग सद्गुरु को पारस कहते हैं। पारस लोहे को तो सोना कर देता है किंतु उसे सोने में दूसरे लोहे को सोना बनाने की क्षमता नहीं होती। लेकिन सद्गुरु वह होता है जो शिष्य को अपने सामान सद्गुरु बनाकर उसको अपने जैसा सद्गुरु बनाने की क्षमता प्रदान करता है।

एक हजार गाय वध करने के जितना पाप लगता है एक शिष्य को बनाने में। शिष्य का जिम्मेवारी गुरु पर होता है।यदि शिष्य दुराचारी निकला, अपराधी निकला, पापी निकला और दिन-रात घटिया काम में लगा हुआ है तो उसका कौन अपराध कैसे बचाएगा?

सूर्य (सद्गुरु) में प्रकाश है किंतु प्रकाश (शिष्य) से भी सूर्य की अनुभूति होनी चाहिए ,तभी सूर्य और प्रकाश का एकत्व अथवा लोक कल्याणकारी होगा।

गुरु दीक्षा और मंत्र का महत्व

गुरु द्वारा प्रदत मंत्र के अभ्यास से विधाता द्वारा रेखा मिटती है दूर्निमित्त कट जाता है ।

गुरु द्वारा दिया गया मन्त्र बहुत गोपनीय होता है | वाणी से भी उच्चारण न होकर हिरदय की कम्पन से यदि उसका उच्चारण हो रहा हो तो बहुत ही अच्छा होता है | इससे हमे बहुत थिर प्राप्त होगा और वह हमे हर तरह की उच्चश्रृंखला से बचाएगा |

कहा गया है की , गुरु मंत्र के जुनराबी तेगा | यह तेगा रूपी मंत्र कायारूपी घर में बैठे दुश्मनो को काटता है अर्थार्त उन्हें समाप्त कर मनुष्य को स्वस्थ्य तथा सुखसांति जीवन प्रदान करता है |

जिससे शिष्य को गुरु में आस्था है गुरु उसकी बैखरी खोल देते हैं और तब वह 10 वर्ष पहले की बातों को अक्षरस कहता जाता है यह ईश्वरीय तत्सम गति का परिचायक है।

उस मंत्र का जिसे गुरु ने दिया है , यदि बार बार अभ्यास होता रहा तो उन पंचभूतो को और उनकी प्रकृतियो को समुल्य जान सकते है |

गुरु द्वारा सिखाये मंत्र के दुरुपोग करने पर तथा उसमे त्रुटि हो जाने पर विपरीत परिणाम भी होता है| इसलिए इस सम्बन्ध में जयादा सतर्कता रखने की आवशकता होती|

आप भले ही महापुरुष संत महात्मा सब कुछ हो जाए मगर गुरु के बिना मंत्र की सिद्धि तथा जीवन की सिद्धि असंभव है ।

दीक्षा संस्कार अवश्य होना चाहिए गुरु के समीप जाने पर उनके आसन से कितनी दूरी पर किस दिशा में तथा कैसे बैठना चाहिए। गुरु से कितना बात करना चाहिए ,अपनी जिज्ञासाओं को कब और कैसे उनके समक्ष रखना चाहिए, इन सब बातों को जानना चाहिए ।

जैसे मुर्गी अंडे को सेती है,कितनी गर्मी देती है और धीरे-धीरे उसमें उसी के तदरूप जीव पैदा होता है ।इसी प्रकार शिष्य भी गुरु की तरह हो जाता है। उसका आचरण ,व्यवहार ,वेशभूषा अपने गुरु के सदृश्य हो जाता है। आप यदि शक्ति के उपासक हैं तथा गुरु से दीक्षित है जो 21 दिन या 21 महीने में ही आपकी प्रकृति तथा प्रवृत्तियों में गुरु के तदरूप बदलाव अवश्य हो जाना चाहिये।

गुरु पूर्णिमा पूजा का महत्व

।।अघोरअन्नाम परो मंत्रः नास्तित्तवम गुरो परम्।।

गुरु-का-महत्व
गुरु-का-महत्व

परम पूज्य अघोरेश्वर महाप्रभु ने अपने वाणी से कहा हैं अघोर मंत्र से श्रेष्ठ कोई मंत्र नहीं और गुरु से श्रेष्ठ कोई तत्व नहीं हैं।
गुरु पूर्णिमा के दिन गुरु की पूजा करने का विशेष महत्व होता है। गुरु की पूजा करना इसलिए भी जरूरी है क्योंकि उनकी कृपा से व्यक्ति कुछ भी हासिल कर सकता है।

गुरु के बिना किसी भी व्यक्ति को ज्ञान की प्राप्ति नहीं हो सकती है।गुरु का जीवन में बहुत महत्व होता है। गुरु शिष्य के जीवन में व्याप्त अंधकार को मिटाकर प्रकाश फैलाते हैं।

धार्मिक ग्रंथों में लिखा है कि जिस तरह व्यक्ति इच्छा प्राप्ति के लिए ईश्वर की भक्ति करता है। ठीक उसी तरह व्यक्ति को जीवन में सफल होने के लिए गुरु की सेवा और भक्ति करनी चाहिए। साथ ही गुरु प्राप्ति के लिए प्रयत्नशील रहना चाहिए।

गुरु का अभिप्राय ज्ञान होता है। गुरु के सानिध्य रहकर उनकी सेवा और भक्ति करने से व्यक्ति को सद्बुद्धि और शक्ति प्राप्त होती है। साथ ही जीवन का मार्ग प्रशस्त होता है।गुरू के बिना एक शिष्य के जीवन का कोई अर्थ नहीं है।

रामायण से लेकर महाभारत तक गुरू का स्थान सबसे महत्वपूर्ण और सर्वोच्च रहा है। गुरु की महत्ता को देखते हुए ही महान संत कबीरदास जी ने लिखा है- “गुरु गोविंद दोऊ खड़े काके लागू पाये, बलिहारी गुरु आपने गोविंद दियो बताऐ।” यानि गुरू का स्थान भगवान से भी कई गुना ज्यादा बड़ा होता है।

गुरु संग छल का परिणाम

गुरु से कपट का परिणाम यह होगा कि वह जो भी बतला रहा है, कह रहा है ,वह फलीभूत नहीं होगा ।आप भले ही छल से विद्या को सीख ले मगर वह फलित नहीं होगी।

एक को ही साधो । बहुत के चक्कर में मत पड़ो बहुत के चक्कर में पड़ने पर न यही होगा न वही होगा। दोनों गया। इसी को कहते हैं गुरु संग छल।

गुरु से तो छल-कपट और चोरी कभी नहीं करनी चाहिए ,सुदामा ने एक मुट्ठी चना ही चुराया था,उसी कारन से कृष्ण का सखा होने के बावजूद गरीब रहे।हर वस्तु का अपना एक मूल्य होता है, बिना मूल्य के उसे प्राप्त करना ही छल – कपट है |

यदि आपमें छल भरा है तो गुरु अपने अंतरात्मा की अभिव्यक्ति नहीं करेंगे | वे ईश्वर के मार्ग को प्रकट नहीं करेंगे | आपके आने और आपके दण्डप्रणाम करने के बाद आपको विदा कर देंगे|

गुरु के प्रति छल कपट पूर्ण व्यवहार करने पर वांछित सफलता नहीं मिलती है, जीवन भर दुख तथा वेदना ही प्राप्त होती है, मृत्यु के पश्चात मृत्यु शैया पर हो तो महान वेदना का स्वागत करना पड़ता है।

  • गुरु चयन में सतर्कता बरतें।

आजकल पश्चिमी देशों में हर तरह के धर्मगुरु मिलते हैं। वह बहुत अच्छी-अच्छी बातें बताते हैं ,जैसे नक्शा खींचकर बता दिया जाता है। जिस रास्ते का वे उपदेश करते हैं उस रास्ते पर एक डेग भी चले नहीं होते हैं। रास्ता बताने का अधिकार उसी को है ,जो उस पर चला हो क्योंकि इस मार्ग के ऊंचा -नीचा अच्छा बुरा तथा रोड़ा -पत्थर का उसे ज्ञान होता है ।उसके बताए मार्ग पर चलकर आदमी सफलता को प्राप्त करता है। तो ध्यान रहे बंधुओ हमेशा सोच समझकर के गुरु का चयन करें क्योंकि आपकी जिंदगी की बागडोर उसके हाथ में है।

  • विपत्ति में गुरु के निर्देशों का पालन करें।

आप सतर्क तथा स्थिर हो अन्यथा परिस्थितियों के तूफान के चलते व्यग्रता तथा बेचैनी की स्थिति में कबार कर फेंका जा सकते है। इस दुखद स्थिति से बचने के लिए गुरुजनों के संकेतों पर ध्यान दें। गुरुजनों पर आश्रित रहकर उनके संकेत और मार्गदर्शन पर चलने वाले व्यक्तियों पर इन दुखद परिस्थितियों का प्रभाव कम होता है।

परंतु यदि हम उनको अनदेखी करते रहे उनमें श्रद्धा और विश्वास ना हो उनके आदेशों निर्देशों में कोई रुचि ना हो तो हमारा उनके यहां आना-जाना निरर्थक है।

गुरु के नख की किरणे पारदर्शी की दृष्टि देती है।

समय और काल के वैध शासक और गुरु हुआ करते हैं। वह उस समय काल में बहुत ही जीवन प्रदायक हुआ करते हैं।

  • गुरु को मन,कर्म और वचन से प्रणाम करें।
गुरु-का-महत्व
Gurudev Awdooth baba Samuhratn ramji

वह जो हमारा गुरु है, देवता है ,या साधु है, वह थिर है ।उसकी हर कहानी इस पृथ्वी से जुड़ी हुई है।

गुरु के मनोस्थिति के अनुकूल होने तथा विभिन्न कार्यों के करने के समय उनकी मुद्राओं को ध्यान में रखकर कार्य करने पर हमें बहुत लाभ होगा उसमें घाटा नाम की कोई वस्तु नहीं है।

अपनी बुद्धि ,मन, कर्म और वचन से अपने दृढ़ संकल्प द्वारा हम उस नाविक को प्रणाम करें ।जो हमें इस भवसागर से पार उतारने के लिए घाट पर अपनी नौका लेकर तैयार खड़ा है ।चाहे वह नौका अपने जीवन की अंतिम नौका हो चाहे मध्य की नौका हो।

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