महाशक्ति भगवती की उपासना एवं पूजा कैसे करें?

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बहुत से लोगों की धारणा होती है कि हम अगर भगवती उस महाशक्ति को सुंदर वस्त्र आभूषण और फल मेवा इत्यादि चढ़ाएंगे तो वह हम पर जरूर प्रसन्न होगी।फल आभूषण मेवा इत्यादि को देखकर कौन नहीं प्रसन्न होता है।

परंतु हम किसकी बात कर रहे हैं? हम भगवती उस महाशक्ति की बात कर रहे हैं, उस परमेश्वरी पराप्रकृति की बात कर रहे हैं यहां पर। जिससे हम स्वयं हाथ पसार कर मांगते हैं तथा जो स्वयं ब्रह्मांड की रक्षक और कर्ताधर्ता है उसको भला हम क्या दे सकते हैं।

यह तो बाह्य आडंबर है, मगर ऐसा ना सोचकर हम उस भगवती को एक तरीके से लालच देते हैं यह फलाना काम मेरा करा दो मांँ जगदंबे तो मैं आपको यह चढ़ावा चढाऊँगी।जब आप यह सब कुछ सोचते हो तब आप यह नहीं सोचते कि आप किसके लिए यह सब बोल रहे हो , जिससे आप खुद ही सब मांगते रहते हो हमेशा दिन-रात हाथ फैलाकर ,झोली फैला कर , उसके सामने विनती करते हो मन्नते मांगते हो और उसको आप क्या दे सकते हो? भगवती पर तो सिर्फ श्रद्धा चढ़ती है।

महाशक्ति भगवती को कैसे जाने?
परम पूज्य अघोरेश्वर महाप्रभु ने कहा है कि भगवती तो भावना की भूखी होती है।

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(अघोरेश्वर बाबा भगवान राम जी)

भगवती को भाव से पूजना होगा, भाव से ही जानना होगा ,भाव से ही देखना होगा ,जहां भाव का अभाव होगा वहां पर तो वह बिल्कुल नहीं होगी।आपकी भावना की भूखी है, और भाव से ही आप जल फल फूल इत्यादि जो अर्पण करते हैं ,वह उसकी गंध मात्र से, वायु के माध्यम से, अग्नि के माध्यम से, उस तक पहुंचता हैं।

यह जानता हूं बहुत से लोग ना पूजा जानते हैं, ना पाठ जानते हैं ,ना हवन जानते हैं, ना चिंतन जानते हैं । लगे हुए हैं।वहीं परिस्थिति है कि हे भगवती अष्टभुजा ना मैं पूजा जानता हूं ,ना मैं पाठ जानता हूं, अब आप ही इसको, जो कुछ मुझसे हो पा रहा है। यह मैं जानता हूंँ,

अच्छी तरह से समझ ले की सोने चांदी से देवी की पूजा करने पर व्यक्ति अगले जनम में दरिद्र होता है तथा पुष्प ,फल , दुब ,घास आदि से पूजा करता है , वह व्यक्ति यदि जन्म लेना पड़ा तो धनवान सम्पन ओर सुखी होता है|

ना मैं गुरु का सेवन किया हुँ, ना गुरु के पास रहकर चिंतन किया हूंँ, ना उनसे सीखने के लिए कभी कोशिश किया हूंँ,ना शास्त्र से सीखने के लिए कभी प्रयत्न किया हूंँ, ना अच्छे सत्संग में बैठकर कभी प्रयत्न किया हूंँ, इसकी आभाव मुझ में खटक रहा है। तदपि, उन में श्रद्धा है। और जब यह श्रद्धा है, तो श्रद्धा ही आप हैं।

माता महाशक्ति माँ सर्वेश्वररी भगवती का कोई ओर और छोर नहीं है।

उस भगवती का यह जो व्यापकता है, उस व्यापकता को हम कहे कि हम दर्शन कर लेंगे, उस व्यापकता को हम समझ जाएंगे, तो उसका कोई ओर -छोर नहीं है। तदपि,जिसका ओर और छोर नहीं है ,वह कैसे कोई उसकी थाह लगा सकेगा, कि इसका यही माप-दंड है। नहीं तौला जा सकता है उसको कैसे तौल सकते हैं जो आतौल है।

भगवती का कोई जाति नहीं होता। वह सदैव कुमारी होती है और उसका कोई जाति धर्म और देश नहीं होता वह सब देश की होती है सर्वकाल में होती है बराबर वह कुमारी रहती है, पंचकन्याओ की तरह।सदैव, सदैव कुमारी रहती हैं।

वह मांँ भगवती महाभैरव का लीला ,क्रीडा और उनके उत्साह का, आहाद का एक अंग है ।उस भगवती को जानने के लिए सुनने के लिए समझने के लिए हम लोगों के पास व स्थिरता नहीं है। जिस स्थिरता में वह प्राप्त किया जाता है।

यह जो भगवती है उसके कृत्यों को और उसकी पकड़ को समझने के लिए अपना बहुत बहुत कुछ करना पड़ता है कितने बार कितने लोगों ने अपने को बलि दे चुका है तदपि उसे नहीं पहचाना है, नहीं जाना है।

हम लोग आनेको जन्मों से असिद्धि को प्राप्त हुआ है कारण क्या है? यही कारण है कि हम लोग बंधुओं उस महासिद्धेश्वरी की जो भवानी है,भगवती है उसे हमने सही ढंग से स्वीकार नहीं किया है।


भगवती जिसका हम दर्शन के बारे में बातें करते हैं दर्शन करें आपने उनके रूप के दर्शन करते हैं, यह उन्हीं का रूप है । पर आपका आपके दिमाग में मस्तिष्क में कुछ और ही बैठा हुआ इसलिए औरों की तरह बढ़ते हैं।भगवती तो को इन वृक्ष लताएं, पेड़ पौधे में हरे हरे घासो मे जो आभा है कांति है रेश्मिया है,उनमे कभी नहीं देखने का कोशिश किया है ।

पारलौकिक माता कौन हैं?


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(मांँ अष्टभुजा)

हम लोगों को पारलौकिक माता के प्रति आदर होना चाहिए स्नेह होना चाहिए ।बराबर जीवन में उनकी सेवा करनी चाहिए कैसे उनको सेवा जाए? जैसे कोई मुर्गी अंडे को सेती हैं।

आदिशक्ति , मांँ भैरवी, मांँ दुर्गा, अब जिस भी नाम से पुकारे यही पारलौकिक माता महाशक्ति माँ सर्वेश्वररी हैं। इन्हीं को पारलौकिक माता भी कहते है। इनका तो कहना ही क्या है ,इस लोक में भी सुख देती है ,और परलोक में भी सुख देती हैं ।इस लोक में भी रक्षा करती है और परलोक में भी रक्षा करती हैं ।

अगर उनके हाथ हम लोगों पर से हट जाए, उनकी छाया हट जाती है ,उस वक्त हम लोग भहराकर इस भूमि पर गिर जाते हैं। कोई स्थान नहीं रहता है फिर भी उसी पृथ्वी की गोद में जा गिरते हैं और उनके ही चरणों में गिरना पड़ता है ।तदपि, हमारा अपराध हमारे अपने ओर से क्षमा नहीं हो पाता है। फिर माता ही उसको क्षमा करती हैं संभालती है पृथ्वी रूप होकर संभालती है ।करुणा रूप होकर संँभालती है।

जो भगवती है भवानी है वह हम लोगों के बिल्कुल पीछे पीछे घूम रही है कह रही है , टहल रही हैं, मिलने को आतुर है बंन्धुओ।परंतु पूजा ना पाठ, जाने अष्टभुजा वाली हालत है।

किसी का सुन कर के आप कान से और आँख से बहुत फर्क होता है। इस तरह कि यदि आपकी दृष्टि रहा तो आप भगवती को कहांँ पा पाएंँगे ,भगवान को कहांँ पाऐगे।आप तो अपने में ही उलझे हुए हैं।

आपको यदि भगवती ,भवानी मिलना चाहेगी ,आपको घेर कर के आपके वैसे ही सज्जनों से महापुरुषों से, वातावरण से, आप घूमते घूमते ले आ के उस दरवाजे तक खड़ा कर देंगी। कि यह लो मैं यह मैं हूंँ, यही मेरी विद्या है, और यही मेरा दर्शन है, और यही मेरा सर्व सिद्धियांँ हैं, इसे तुम लो।

भगवती की पूजा प्रार्थना एवं उपासना

मांँ भगवती को अपनी इच्छा अनुसार फल, पुष्प ,अक्षत रोली, सिंदूर और चुनरी सहित जो भी सामग्री है उनको अर्पण करते हुए सिर्फ और सिर्फ यही पाठ करें कि मांँ भगवती मैं पूजा पाठ करना नहीं जानता मुझे जो आता है जैसे आता हैं वह आप को समर्पित है।इसे स्वीकार करे। और उनकी पूजा पिले फूलो से करे जिससे आपका कल्याण होगा।

महाशक्ति भगवती से प्रार्थना करें कि मैं नहीं जानता पूजा पाठ करना, है भगवती अष्टभुजा। मैं सिर्फ आपका स्मरण जानता हूंँ। आप मांँ है, मैं यही जानता हूंँ। मांँ, मांँ कह के मै रट लेता हूंँ। इससे अधिक कुछ नहीं जानता हूंँ।

मांँ आपकी यदि मैं योग्य हूंँ, मेरे में योग्यता है, तो आप मुझे ऐसे ही स्वीकार करेंगी। मैं यदि अयोग्य हूंँ तो मेरे जीवन को जर्जर है ही, और जिस तरह की यह अयोग्यता है, उस अयोग्यता के हट जाने पर, और हटाने के लिये, आप ही प्रयत्न कर सकती हैं। यह मेरी प्रयत्न की, मेरी बुद्धि की बात नहीं है। मेरी बुद्धि की विषम नहीं है।

वह मिलेगीं, अवश्य मिलेंगी, यदि हमारी मति ठीक रहेगी, गति ठीक रहेगी और हम वचनबद्धता को स्वीकार करेंगे। हम जब तक भूले थे, भटके थे ,अंधकार में थे तब तक मुझसे जो कुछ भी हुआ , उस सब को वह क्षमा कर देगी।

शक्ति की अच्छी समझ रखना परम आवश्यक है।

जिस शक्ति की उपासना करते हैं, उसके स्वरूपों के बारे में भी आपको अध्ययन करना चाहिए। वह शक्ति स्व- संहारक भी हो सकती है। प्राप्त करने वाला नासमझी में उससे अपना संहार भी कर सकता है। जैसे अग्नि एक शक्ति है जो जलाकर भस्म भी कर सकती है तथा संयम से काम लेने पर उसी अग्नि पर आप खाना पका सकते हैं। उसे ताप सकते हैं, तथा अनेकानेक जीवन रक्षक कार्य कर सकते हैं। रेलगाड़ी एक शक्ति है उसके सामने खड़े हो जाएंगे तो वह काट देगी। लेकिन बगल से उस पर सवार होकर सुदूर स्थान पर सुरक्षित पहुंँच सकते हैं। इसलिए शक्ति के स्वरूप तथा उसके विभिन्न रूपों के गुण धर्म के बारे में उपासक को अच्छी समझ रखना परम आवश्यक है।

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(1) Comment

  1. Chandra Bhushan Pandey

    जय माँ अम्बे .,🙏🙏💐

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